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आंध्रप्रदेश के फायदे के लिए छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को डुबोया जा रहा है -कांग्रेस

रायपुर / पोलावरम पर सरकार और भाजपा नेताओं की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि भाजपा छत्तीसगढ़ के आदिवासियों से विश्वासघात कर रही है, छत्तीसगढ़ के हितों के खिलाफ जल-जंगल-जमीन का सौदा कर रही है। पोलावरम परियोजना के बैकवॉटर प्रभाव से बस्तर और सुकमा के दर्जनों गांव, हजारों एकड़ जंगल, उपजाऊ खेत और हमारे आदिवासी भाई-बहन जलमग्न होने की कगार पर हैं। दिल्ली और आंध्र प्रदेश के दबाव में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान और बस्तर के अधिकारों का आत्मसमर्पण कर दिया है। कांग्रेस पार्टी यह साफ करती है कि जब तक बैकवॉटर का सही सर्वे और शत-प्रतिशत पुनर्वास तय नहीं होता, छत्तीसगढ़ की एक इंच जमीन भी डूबने नहीं दी जाएगी।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि भाजपा का डबल इंजन छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को राहत देने के लिए नहीं, बल्कि आंध्र के लाभ के लिए बस्तर को डुबोने के लिए चल रहा है। आंध्र प्रदेश में निर्माणाधीन पोलावरम परियोजना को केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा लगातार बजट और गति दी जा रही है, जबकि इसके कारण छत्तीसगढ़ के सुकमा और बस्तर क्षेत्र के दर्जनों गाँव जलमग्न होने की कगार पर हैं। भाजपा सरकार छत्तीसगढ़ के प्रभावितों के पुनर्वास और मुआवजा पर मौन है। बस्तर की समृद्धि और जल-जंगल-जमीन की बात करने वाली भाजपा आज पोलावरम पर मौन धारण करके बस्तर के विनाश का रास्ता साफ कर रही है।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान पोलावरम के बैकवॉटर सर्वे और आदिवासियों के पूर्ण पुनर्वास तथा मुआवजे तक कार्य रोकने की स्पष्ट और सख्त मांग केंद्र के सामने रखी गई थी। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में जलभराव डूबान और जन-धन के नुकसान की आशंका को लेकर भूपेश बघेल सरकार ने कई कानूनी, प्रशासनिक और तकनीकी कदम उठाए थे। सुप्रीम कोर्ट में विधिक याचिका लगाकर भूपेश सरकार ने आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा पोलावरम बांध की ऊंचाई और डिजाइन में बिना छत्तीसगढ़ की सहमति के किए जा रहे बदलावों का विरोध करते हुए सर्वाेच्च न्यायालय में अपनी याचिका को मजबूती से आगे बढ़ाया, जिसमें मांग की गई कि जब तक छत्तीसगढ़ के डूब क्षेत्र का पूर्ण पर्यावरणीय और जन-हानि मूल्यांकन नहीं हो जाता, तब तक निर्माण कार्य पर रोक लगाई जाए। सुकमा जिले के कोंटा क्षेत्र और उससे जुड़े गांवों (जैसे इंजरम, फंदीगुंडा, मेटागुंडा आदि) पर बैकवॉटर के असर का आंकलन करने के लिए जल संसाधन विभाग और तकनीकी विशेषज्ञों की विशेष टीमें गठित की गईं। इन टीमों को प्रभावित जनजातीय आबादी, कृषि भूमि और वनांचल क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया गया। कांग्रेस सरकार ने केंद्र सरकार और जल शक्ति मंत्रालय के समक्ष यह रुख साफ रखा कि यदि परियोजना बनती है, तो सुकमा जिले को डूब से बचाने के लिए आंध्र प्रदेश तटबंध (Retaining Wall) का निर्माण करे। साथ ही, प्रभावित आदिवासियों के लिए पूर्ण पुनर्वास, पुनर्व्यवस्था और मुआवजा नीति लागू करने की मांग की गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और जल संसाधन मंत्रालय ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री तथा आंध्र प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर जनसुनवाई कराने और छत्तीसगढ़ के हित में तकनीकी समीक्षा करने का आग्रह किया। ओडिशा सरकार (जिसका क्षेत्र भी डूबान में आ रहा था) के साथ समन्वय स्थापित कर संयुक्त रूप से पर्यावरणीय चिंताओं और अंतर-राज्यीय जल विवाद को उठाया गया। मूल सवाल यह है कि पिछली कांग्रेस सरकार ने पोलावरम के दुष्परिणामों पर जो कड़ा रुख अपनाया था, वर्तमान भाजपा सरकार उस पर पीछे क्यों हट गई?

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