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सुरक्षित मातृत्व की ओर एक अहम कदमः गर्भावस्था के दौरान स्वस्थ आदतें

राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस (11 अप्रैल) के अवसर पर डॉ. वेरोनिका आइरीन युएल गायनेकोलॉजिकल लैप्रोस्कोपिक एवं रोबोटिक सर्जन सीनियर कंसल्टेंट, स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग

 

MMI नारायणा मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल, लालपुर, रायपुर

हर साल 11 अप्रैल को भारत में राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षित गर्भावस्था और जागरूकता का एक महत्वपूर्ण संदेश है। मातृत्व जीवन का एक अनमोल अनुभव है, लेकिन यह उतना ही संवेदनशील और जिम्मेदारी भरा भी होता है।

आज भी कई महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें गर्भावस्था के दौरान सही पोषण और समय पर चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल पातीं। यही कारण है कि कई बार साधारण सी लापरवाही गंभीर जटिलताओं का रूप ले लेती है। हमें यह समझना होगा कि सुरक्षित मातृत्व किसी सुविधा का विषय नहीं, बल्कि हर महिला का अधिकार है।

गर्भावस्था में स्वस्थ आदतों का महत्व

गर्भावस्था के दौरान शरीर और मन दोनों में कई बदलाव आते हैं। इस समय अपनाई गई जीवनशैली न सिर्फ मां के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर भी सीधा असर डालती है। अगर इस दौरान सही खानपान, नियमित जांच और मानसिक संतुलन बनाए रखा जाए, तो गर्भावस्था का सफर अधिक सुरक्षित और सहज बन सकता है।

स्वस्थ गर्भावस्था के लिए जरूरी कदम

1. संतुलित और पौष्टिक आहार

एक गर्भवती महिला के लिए आहार सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है। हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध और दुग्ध उत्पाद, दालें, अंडे, फल और पर्याप्त मात्रा में आयरन, कैल्शियम व फोलिक एसिड का सेवन जरूरी है। सही पोषण एनीमिया से बचाव करता है और शिशु के स्वस्थ विकास में मदद करता है।

2. नियमित जांच (एंटेनाटल चेक-अप)

समय-समय पर डॉक्टर से जांच कराना बेहद जरूरी है। इससे ब्लड प्रेशर, वजन और शिशु की वृद्धि पर नजर रखी जा सकती है। अल्ट्रासाउंड और जरूरी जांचें किसी भी संभावित समस्मा को पहले ही पहचानने में मदद करती हैं।

3. पर्याप्त आराम और नींद

गर्भावस्था में शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत होती है। रोजाना कम से कम 7-8 घंटे की नींद और दिन में थोड़ा आराम शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है।

4. हल्का व्यायाम और योग

डॉक्टर की सलाह से हल्का व्यायाम या प्रेग्र्मोंसी योग शरीर को सक्रिय रखता है, रक्त संचार बेहतर करता है और प्रसव के लिए शरीर को तैयार करता है।

5. मानसिक और भावनात्मक संतुलन

एक सकारात्मक सोच, तनाव से दूरी और परिवार का सहयोग गर्भावस्था को सुखद बनाते हैं। मां की मानसिक स्थिति का सीधा असर शिशु पर भी पड़ता है, इसलिए खुश रहना भी एक तरह की दवा है।

6. हानिकारक चीजों से दूरी

तंबाकू, शराब और नशीले पदार्थों से पूरी तरह दूर रहना जरूरी है। ये न सिर्फ मां के लिए, बल्कि शिशु के लिए

भी गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।

7. स्वच्छता और व्यक्तिगत देखभाल

साफ-सफाई का ध्यान रखना संक्रमण से बचाव के लिए बेहद जरूरी है। साफ पानी, स्वच्छ भोजन और नियमित हाथ धोने जैसी आदतें छोटी लग सकती हैं, लेकिन इनका असर बहुत बड़ा होता है।

8. जागरूकता और तैयारी

प्रसव के संकेतों को समझना, आपात स्थिति में क्या करना है यह जानना, और समय पर अस्पताल पहुंचने की योजना बनाना- ये सभी बातें सुरक्षित मातृत्व के लिए बेहद जरूरी हैं।

सुरक्षित मातृत्वः सबकी जिम्मेदारी

देशभर में सरकार और कई संस्थाएं, जैसे FOGSI, महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। नियमित जांच, टीकाकरण, पोषण और संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन सिर्फ नीतियां ही काफी नहीं हैं- परिवार, समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि हर महिला को सुरक्षित मातृत्व का अधिकार मिले।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस हमें यह याद दिलाता है कि एक स्वस्थ मां ही एक स्वस्थ पीढ़ी की नींव रखती है। सही जानकारी, संतुलित आहार, नियमित चिकित्सा देखभाल और भावनात्मक सहयोग के साथ हम इस दिशा में एक बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

आज जो देखभाल हम एक मां को देते हैं, वही कल हमारे समाज का भविष्य तय करती है।

“स्वस्थ मां – स्वस्थ शिशु – स्वस्थ राष्ट्र”

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