
नई दिल्ली। वैश्विक तेल बाजार में एक बड़ा झटका सामने आया है, जिसने भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। जैसे ही अमेरिका द्वारा दी गई छूट की समयसीमा खत्म हुई, रूस और ईरान से तेल खरीदने का रास्ता लगभग बंद हो गया। इस फैसले ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तय की गई डेडलाइन अब समाप्त हो चुकी है और वाशिंगटन ने इसे आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने घोषणा करते हुए कहा कि रूस और ईरान से तेल खरीद के लिए जारी सामान्य लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा।

दरअसल, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और युद्ध जैसी स्थिति के कारण वैश्विक स्तर पर तेल संकट गहराने लगा था। इसी को देखते हुए अमेरिका ने पहले प्रतिबंधों के बावजूद कुछ देशों को अस्थायी छूट दी थी, ताकि बाजार में आपूर्ति बनी रहे और कीमतें नियंत्रण में रहें। लेकिन अब यह राहत पूरी तरह खत्म हो गई है।
रूसी तेल पर दी गई छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो चुकी है, जबकि ईरानी तेल पर छूट 19 अप्रैल तक ही सीमित है। इसका सीधा असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर पड़ सकता है, जो सस्ती दरों पर इन देशों से तेल खरीदते रहे हैं।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय के अनुसार, 12 मार्च को भारतीय रिफाइनरियों को पहले से लदे रूसी तेल को खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दी गई थी। यह छूट केवल उन जहाजों के लिए थी, जो प्रतिबंध लागू होने के समय समुद्र में थे। अब यह अवधि पूरी हो चुकी है और नया तेल खरीदने की अनुमति नहीं होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। भारत को अब वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी होगी, जिससे लागत बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह फैसला सिर्फ आर्थिक दबाव बढ़ाएगा, या फिर दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट की ओर बढ़ रही है? आने वाले दिनों में इसका असर आम लोगों की जेब से लेकर वैश्विक राजनीति तक साफ दिखाई दे सकता है।



